By: शालू मिश्रा अग्रवाल

चाहत चाँद को,
पाने की रखता है,
देखो न! वो टिमटिमाता तारा,
कुछ मुझसा लगता है,

हो अँधेरी रात,
या हो चाँदनी की बात,
चुपके से,
वो चाँद को निहारा करता है,
देखो न!
वो टिमटिमाता तारा,
कितना प्यारा लगता है,

चाँद-तारे,
की सी कहानी अपनी,
फिर भी ख़ूबसूरत,
ज़िन्दगानी अपनी,
मोहब्बत का ये रूप,
सारे जहाँ में जचता है,
देखो न!
वो टिमटिमाता तारा,
हम तुमसा लगता है...

#निःशब्द

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